देवभूमि उत्तराखंड प्राचीन काल से दिव्या आत्माओं का निवास स्थान रहा है। इस देवभूमि में जन्मे हर एक महान व्यक्ति का उत्तराखंड के विकास में अनमोल योगदान रहा है। चाहें वह कला के क्षेत्र में हो या संस्कृति के क्षेत्र में। हर क्षेत्र में उत्तराखंड के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य किया गया। उन्ही महान विभूतियों में से एक है सुमित्रा नंदन पंत जो की उत्तराखंड के प्रमुख कवियों में से एक है। आज के इस लेख के माध्यम से हम आपके साथ सुमित्रा नंदन पंत जीवन परिचय के बारें में बात करने वाले है की किस तरह से उत्तराखंड के महान कवियों के श्रेणी में गिने जाते है एवं उत्तराखंड लेखन कला में सुमित्रा नंदन पंत का योगदान।
सुमित्रा नंदन पंत जीवन से जुड़ें तथ्य
प्रचलित नाम | सुमित्रानंदन पंत |
वास्तविक नाम | गोसैन दत्त |
जन्म | 20 मई 1900, कौसानी, उत्तराखंड |
मृत्यु | 28 दिसम्बर 1977, प्रयागराज, उत्तरप्रदेश |
जीवनकाल | 77 वर्ष |
माता का नाम | सरस्वती देवी |
पिता का नाम | गंगा दत्त पंत |
पुरष्कार | पद्म भूषण (1961), ज्ञानपीठ अवार्ड (1969), साहित्य अकैडमी अवॉर्ड (1960) |
कविताएँ | मानव, बापू के प्रति, अँधियाली घाटी में, मिट्टी का गहरा अंधकार, ग्राम श्री आदि |
प्रसिद्धि का कारण | लेखक, कवि |
राष्ट्रीयता | भारतीय |
सुमित्रा नंदन पंत जीवन परिचय
हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म सं 20 मई 1900 को उत्तराखंड के राज्य के अल्मोड़ा जिलें के कौसानी गांव में हुवा। जन्म के 6 घंटे पश्चात ही इनकी माता जी का देहांत हो गया जिसके बाद इनके पालन पोषण का दायित्व पिता श्री एवं दादी जी के द्वारा निभाया गया।
कवि की प्रारंभिक शिक्षा अपने ही गांव कौसानी से की गई तथा उच्च शिक्षा के लिए वह बनारस आ गए। बनारस के क्रीन्स कॉलेज में इन्होने दाखिला लिया और अपनी उच्च शिक्षा की तैयारी करते रहे। बचपन से ही पढाई लिखाई का शौक होने के कारण वह एक अच्छे विधार्थी के तौर भी जाने जाते है। बनारस से ही सुमित्रा नंदन पंत जी ने काव्यगत के क्षेत्र में कदम रखा और निरंतर प्रयास करते रहें।
काव्यगत क्षेत्र में प्रवेश
सुमित्रानंदन पंत जी ने शिक्षा के साथ ही लेखन के क्षेत्र में अपना कदम रखा। इन्होने अंग्रेजी भाषा में एक रोमांटिक कविता लिखी जिसके सौभग्य से इनका परिचय काशी में रविंद्र नाथ टैगोर एवं सरोजनी नायडू से हुवा। इसके बाद इन्हें लिखने की प्रेरणा मिली और वह इस क्षेत्र में आगे बढ़ते रहें। बताना चाहेंगे की स्वयं के द्वारा ही इन्होने अपना नाम गुसाई दत्त से बदल कर सुमित्रानंदन पंत रखा।
सन 1950 में ऑल इंडिया रेडिओ के परामर्शदाता पद पर नियुक्त हुए। इन्होने अपनी काव्य शैली में बाह्य और आन्तरिक दोनों पक्षों को सँवारा है। यह छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। वाकई हिंदी काव्य में इनका योगदान अनमोल एवं सर्वोपरि है। इनकी प्रमुख कृतियों में से सरस्वती पत्रिका एक है जिसने काव्य-मर्मज्ञों के हृदय में एक अलग जगह बना दी।
सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख रचनाएँ
सुमित्रानंदन पंत जी हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि है। इनकी रचनाओं को विभिन्न सोपानों में बांटा गया है। इनकी कृतियाँ छायावाद और मानवतावाद के साथ साथ प्रगतिवाद पर आधारित है। सुमित्रानंदन पंत जी के प्रमुख साहित्य निम्न प्रकार से है।
- युगपथ
- चिदंबरा
- पल्लविनी
- स्वच्छंद
- युगांत
- युगांतर
- उच्छवास
- पल्लव
- वीणा
सुमित्रानंदन पंत जी के प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
हिंदी साहित्य के प्रमुख एवं प्रसिद्ध कवि के तौर पर पहचाने जाने वाले सुमित्रानंदन पंत विभिन्न पुरस्कार एवं सम्मान से सम्मानित है। इनकी सबसे प्रमुख कृतियों में से एक चिदंबरा के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत किया गया है। सुमित्रानंदन पंत जी के कौसानी गांव में उनके पुराने घर को संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है जो की सुमित्रानंदन पंत विधिका के नाम से विख्यात है। जहाँ लेखन साहित्य प्रेमी के लिए एक अलग थीम बनाई गई है। जिसमें पंत जी के व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुएं एवं छायाचित्रों के साथ उनके पुरस्कार एवं पुस्तकों को संजोया गया है।